सिंहस्थ 2028 की उल्टी गिनती शुरू, आईएएस हलकों में चर्चाएं तेज, हजारों करोड़ की परियोजनाओं पर प्रशासनिक दौड़

भोपाल. वर्ष 2016 में 22 अप्रैल से 21 मई तक उज्जैन में आयोजित सिंहस्थ एक माह का भव्य धार्मिक आयोजन था, जिसमें विभिन्न आकलनों के अनुसार लगभग 7.5 से 8 करोड़ श्रद्धालु क्षिप्रा तट पर पहुंचे थे. अब ठीक 12 वर्ष बाद वर्ष 2028 में होने वाला अगला सिंहस्थ केवल आस्था का महापर्व नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के इतिहास का सबसे बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशासनिक प्रोजेक्ट बनता दिखाई दे रहा है. वर्ष 2016 की तुलना में इस बार बजट, अधोसंरचना, प्रशासनिक तैयारियों और श्रद्धालुओं की अनुमानित संख्या—सभी कहीं अधिक बड़े पैमाने पर देखे जा रहे हैं. यही कारण है कि सरकारी मशीनरी ने आयोजन की उल्टी गिनती अभी से शुरू कर दी है और प्रशासनिक गलियारों में सिंहस्थ 2028 को लेकर हलचल तेज हो गई है.
हजारों करोड़ रुपये की आधारभूत संरचना परियोजनाओं, करोड़ों श्रद्धालुओं के प्रबंधन और बहुविभागीय समन्वय के कारण यह आयोजन केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक दृष्टि से भी राज्य की सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है. प्रशासनिक हलकों में सिंहस्थ से जुड़े शीर्ष दायित्वों को लेकर चर्चाएं तेज हैं. हालांकि सरकार ने अभी किसी अधिकारी के नाम या अंतिम तैनाती को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है.
सूत्रों के अनुसार सिंहस्थ 2028 के लिए अनुभवी वरिष्ठ अधिकारियों की तैनाती को लेकर प्रारंभिक स्तर पर मंथन शुरू हो चुका है. प्रशासनिक हलकों में यह माना जा रहा है कि आयोजन से जुड़ी परियोजनाओं का आकार हजारों करोड़ रुपये का है और इनका क्रियान्वयन वर्ष 2028 तक चलेगा. ऐसे में इन जिम्मेदारियों को राज्य की सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक नियुक्तियों में गिना जा रहा है. यही वजह है कि इन पदों को लेकर स्वाभाविक रूप से प्रशासनिक स्तर पर रुचि और चर्चाओं का माहौल है. माना जा रहा है कि जिन अधिकारियों को इन परियोजनाओं और मेला प्रबंधन की जिम्मेदारी मिलेगी, वे अगले दो वर्षों तक राज्य की सबसे महत्वपूर्ण विकास योजनाओं की निगरानी करने वाली टीम का हिस्सा होंगे.
सरकार ने भी तैयारियों को वित्तीय प्राथमिकता दी है. वर्ष 2025-26 के राज्य बजट में सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के लिए 2,005 करोड़ रुपये का विशेष प्रावधान किया गया था. इसके अगले ही वर्ष 2026-27 के बजट में यह राशि बढ़ाकर 3,060 करोड़ रुपये कर दी गई. महज एक वर्ष में एक हजार करोड़ रुपये से अधिक की वृद्धि यह संकेत देती है कि अब सिंहस्थ की तैयारियां कागजी योजनाओं से आगे बढ़कर क्रियान्वयन के चरण में पहुंच चुकी हैं.
इतना ही नहीं, राज्य सरकार ने सिंहस्थ से जुड़ी बड़ी अधोसंरचना परियोजनाओं को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार से लगभग 20 हजार करोड़ रुपये के विशेष पैकेज की भी मांग की है. यदि यह पैकेज स्वीकृत होता है तो सड़क, फ्लाईओवर, घाटों का विस्तार, पेयजल, सीवरेज, पार्किंग, यातायात, नदी संरक्षण, डिजिटल कमांड एंड कंट्रोल सेंटर तथा अन्य स्थायी परियोजनाओं को नई गति मिलने की उम्मीद है. सरकार की मंशा केवल सफल आयोजन कराने की नहीं, बल्कि उज्जैन को दीर्घकालिक धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी के रूप में विकसित करने की भी है.
प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि सिंहस्थ का नेतृत्व करने वाले अधिकारियों के सामने केवल मेला संचालन की चुनौती नहीं होगी. समयबद्ध निर्माण कार्य, हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं की निगरानी, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय, वित्तीय अनुशासन, कानून-व्यवस्था, आपदा प्रबंधन और करोड़ों श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उनकी प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल होगा. यही कारण है कि सिंहस्थ से जुड़े शीर्ष पदों को प्रशासनिक सेवा की सबसे प्रतिष्ठित और चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारियों में माना जाता है.
राष्ट्रीय स्तर पर भी सिंहस्थ 2028 को विशेष नजर से देखा जा रहा है. हाल के वर्षों में प्रयागराज महाकुंभ के लिए बड़े पैमाने पर हुए निवेश और अधोसंरचना विकास ने धार्मिक आयोजनों के प्रबंधन का नया मानक स्थापित किया है. ऐसे में मध्य प्रदेश के सामने केवल सफल सिंहस्थ आयोजित करने की चुनौती नहीं है, बल्कि व्यवस्थाओं, अधोसंरचना और प्रशासनिक दक्षता के स्तर पर अपनी अलग पहचान स्थापित करने की भी परीक्षा है. यही कारण है कि राज्य सरकार प्रारंभिक चरण से ही योजनाओं की नियमित समीक्षा, बजटीय विस्तार और प्रशासनिक तैयारी पर विशेष फोकस कर रही है.
फिलहाल शीर्ष प्रशासनिक जिम्मेदारियों पर अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं हुआ है, लेकिन बजट में लगातार वृद्धि, हजारों करोड़ रुपये की विकास योजनाएं, केंद्र से विशेष पैकेज की मांग और प्रशासनिक स्तर पर तेज होती तैयारियां यह स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि सिंहस्थ 2028 को लेकर सरकारी मशीनरी पूरी सक्रियता के साथ काम कर रही है. आने वाले महीनों में शीर्ष स्तर की नियुक्तियां, परियोजनाओं के क्रियान्वयन की गति और प्रशासनिक नेतृत्व की संरचना इस महाआयोजन की दिशा और सफलता तय करेगी.














































