मंदसौर

मंदसौर में 8 फीट की द्विमुखी गणपति प्रतिमा:आगे पंचमुखी गणेश पीछे पगड़ीधारी सेठ में दर्शन देते हैं बप्पा, 21 दिन महाआरती

मंदसौर में गणेश चतुर्थी के साथ 12 दिन के विशेष धार्मिक आयोजन शुरू हो गए हैं। गणपति चौक स्थित द्विमुखी चिंताहरण गणपति मंदिर में विशेष पूजा, हवन और महाआरती का आयोजन किया जा रहा है। मंदिर की करीब 8 फीट ऊंची गणपति प्रतिमा एक ही शिला पर स्थापित है। भक्त इसके आगे और पीछे, दोनों तरफ से दर्शन कर सकते हैं।

मंदिर समिति ट्रस्ट के उपाध्यक्ष नरेंद्र अग्रवाल ने बताया कि प्रतिमा को उत्तर-दक्षिण दिशा के हिसाब से स्थापित किया गया है। उत्तर दिशा में गणपति का पंचमुखी स्वरूप है। इसमें पांच सूंड और चार हाथ हैं। सिर पर मुकुट भी है।

वहीं, दक्षिण दिशा में गणपति का स्वरूप सेठ जैसा दिखाई देता है। इस तरफ बप्पा पगड़ी पहने हुए हैं। इसलिए इसे सेठ गणेश का स्वरूप भी कहा जाता है।

1929 में तालाब से मिली थी प्रतिमा

नरेंद्र अग्रवाल ने बताया कि साल 1929 में यह प्रतिमा मंदसौर में नाहर सय्यद दरगाह के पास एक तालाब से मिली थी। उस समय इसे नरसिंहपुरा ले जाकर स्थापित करने की योजना बनाई गई थी।

प्रतिमा को बैलगाड़ी से ले जाया जा रहा था। वर्तमान गणपति चौक के पास पहुंचने के बाद बैलगाड़ी रुक गई। काफी कोशिश के बाद भी वह आगे नहीं बढ़ी। इसके बाद प्रतिमा को इसी जगह स्थापित कर दिया गया। बाद में इस स्थान का नाम गणपति चौक रखा गया।

देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते हैं

मंदिर समिति के अनुसार, द्विमुखी चिंताहरण गणपति की प्रतिमा अपनी तरह की दुर्लभ प्रतिमाओं में मानी जाती है। यहां रोजाना बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

मंदिर समिति का दावा है कि देश के अलग-अलग हिस्सों के अलावा विदेशी पर्यटक भी यहां दर्शन के लिए पहुंच चुके हैं। श्रद्धालु गणपति को चिंताहरण स्वरूप में पूजते हैं और अपनी मनोकामनाएं लेकर मंदिर पहुंचते हैं।

रोजाना बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

रोजाना बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

12 दिन तक रोज महाआरती होगी

गणेश चतुर्थी के अवसर पर मंदिर में 12 दिनों तक विशेष धार्मिक आयोजन होंगे। इस दौरान रोज रात 8 बजे विशेष महाआरती की जाएगी। इसके अलावा हवन और पूजन कार्यक्रम भी होंगे।

गणेश चतुर्थी के पहले दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे। लोगों ने गणपति के दोनों स्वरूपों के दर्शन कर पूजा-अर्चना की।

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