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Success Story: 84% गिर गए थे शेयर, सरकारी मदद से बची आज सबसे प्रीमियम पेमेंट ब्रांड है ‘अमेक्स’

Success Story Amex: दुनियाभर में क्रेडिट कार्ड प्रदान करने वाली अधिकांश वित्तीय फर्म या बैंक जहां फ्री या बेहद कम ज्वाइनिंग और सालाना फीस के साथ कार्ड ऑफर करती हैं. वहीं अमेरिकन एक्सप्रेस, अपने प्लैटिनम कार्ड के लिए करीब 66 हजार रु. सालाना फीस लेती है। इसके ‘ब्लैक कार्ड’, जिसे सेंटुरियन/सेंचुरियन कार्ड’ भी कहा जाता है, के लिए करीब 4.80 लाख रु. वन टाइम ज्वाइनिंग फीस और 9.60 लाख रु. सालाना फीस देनी पड़ती है। बावजूद इसके कंपनी के दुनियाभर में 14 करोड़ एक्टिव ग्राहक हैं। दरअसल यह ‘प्रीमियमनेस’ और स्टेटस सिंबल ही कंपनी की असली पहचान है। ग्राहक इसे ‘अमेक्स’ कहते हैं।

करीब 176 साल पुरानी इस कंपनी में दो ऐसे दौर आए जब लगा कि यह बर्बाद हो जाएगी। 1963 में ‘एलाइड क्रूड वेजिटेबल ऑइल’ कंपनी के ‘सलाद ऑइल स्कैम’ का खुलासा होने के बाद अमेक्स के शेयर 50% गिर गए थे। वहीं 2008 की मंदी में कंपनी के शेयर 84% तक गिर गए। तब दिवालिया होने से बचने के लिए अमेक्स ने खुद को कार्ड कंपनी से ‘कमर्शियल बैंक’ में बदला ताकि जनता से डिपॉजिट फंड मिल सके। इसके बाद अमेरिकी सरकार से 339 करोड़ डॉलर की सरकारी मदद मिली, जिससे कंपनी संकूट से उबरी।

20 लाख करोड़ रु. की कंपनी है ‘अमेक्स’

कंपनी की रिपोर्ट के अनुसार इसके नेटवर्क पर सालाना करीब 145 लाख कराड र कार का ट्राजशन वर्तमानब रुपए 20 लाख करोड़ रुपए है। दुनियाभर में इसके करीब 14 करोड़ एक्टिव कार्डधारक हैं। दुनियाभर में इसके 74 हजार से अधिक कर्मचारी हैं। 2026 के ताजा आंकड़ों के अनुसार काम करने के लिहाज से दुनिया की टॉप 100 कंपनियों में यह चौथे नंबर पर है। हाल ही में अमेरिकी क्रेडिट कार्ड ग्राहकों पर जेडी पावर द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार कंपनी ग्राहक संतुष्टि के मामले में दुनिया में पहले नंबर पर है।

तीन कंपनियों के विलय ने रखी थी अमेरिकन एक्स की नींव

1850 में न्यूयॉर्क के बफेलो में 3 कंपनियों-वेल्स, लिविंग्सटन-फागों और बटरफील्ड वासन एंड कंपनी के विलय से अमेरिकन एक्सप्रेस की स्थापना हुई। उस समय यह एक एक्सप्रेस शिपिंग कंपनी थी, जो डाक से लेकर सोना, कीमती सामान और दस्तावेज का पार्सल करती थी। 1890 के दशक में फाइनेंशियल सर्विसेज में कदम रखा।सबसे तेजी से सामान और डाक पहुंचाने की एक्सप्रेस सेवा के कारण इसका नाम अमेरिकन एक्सप्रेस कंपनी रखा गया।

यूं संकट में फंसी थी…

केंद्रित बिजनेस मॉडलः पूरा बिजनेस ‘प्रीमियम और कॉर्पोरेट ट्रैवल एंड एंटरटेनमेंट’ खर्च पर निर्भर था। मंदी आने पर यात्रा और बिजनेस मीटिंग्स के बजट कटते, जिससे अमेक्स का रेवेन्यू प्रभावित होता था।

कोर बिजनेस पर अधिक निर्भरता यह इन्वेस्टमेंट बैंकों की तरह होलसेल फंडिंग पर निर्भर था। जब 2008 की मंदी में क्रेडिट मार्केट फ्रीज हुआ तो इसकी फंडिंग रुक गई, जो इसके लिए घातक साबित हुई।

बदलावों में सुस्ती: 2010 में जब फिनटेक स्टार्टअप्स और मोबाइल पेमेंट्स उभर रहे थे, तब कंपनी ‘प्लास्टिक और पेपर’ रिवॉर्ड पर ही अड़ी रही। निगरानी और नियंत्रण में चूक कंपनी अंदरूनी निगरानी में चूकती रही। 1963 के सलाद ऑइल स्कैम से लेकर क्रेडिट रिस्क असेसमेंट तक ऑडिट में विफल हुई। डिफाल्ट बढ़ने पर निपटना मुश्किल हुआ।

इस तरह की वापसी…

खुद को कमर्शियल बैंक में बदला 2008 के संकट में खुद को एक बैंक होल्डिंग कंपनी में बदल लिया। इससे न केवल सरकारी वित्तीय मदद मिली, बल्कि जनता से डिपॉजिट स्वीकार करने के योग्य बन गई।

संकट में वॉरेन बफेट का निवेश खराब संकट के दौर में भी वॉरेन बफेट ने निवेश जारी रखा। इससे बाजार में भरोसा बना रहा। कंपनी को बाउंस बैक करने का मनोवैज्ञानिक संबल मिला।

युवाओं पर फोकस डाइनिंग, स्ट्रीमिंग सर्विसेज के सब्स्क्रिप्शन और लाइफस्टाइल के ट्रेंडी रिवॉर्ड्स जोड़े। इससे भारी संख्या में अमीर युवा जुड़े।

प्रीमियम सस्क्रिप्शन मॉडल ट्रांजैक्शन फीस की जगह सालाना फीस मॉडल पर जोर दिया। लोग केवल कार्ड रखने के लिए 250 से 695 डॉलर तक फीस देते हैं। बदले में प्रीमियम सुविधाएं मिलती हैं।

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