मंदसौर

Mandsaur News: मां चंबल को ओढ़ाई 1111 फीट लंबी चुनरी, महादेव मंदिर निर्माण के लिए तीन दिन में 21 लाख रुपए की घोषणा

Mandsaur News: मंदसौर जिले में सीतामऊ तहसील के ग्राम भगोर में चल रही श्रीमद् देवी भागवत कथा के चौथे दिन उत्साह का वातावरण रहा। 1111 फीट लंबी चुनरी यात्रा ने हर किसी को उमंग से भर दिया। भजनों व जयकारों के बीच यात्रा ने नगर भ्रमण किया। श्रद्धालुओं ने मां चंबल को चुनरी ओढ़ाई। इस दौरान श्रद्धालु जमकर थिरके। माता रानी के जयकारों व भजनों से वातावरण और भी उत्साहमय हो गया। जगह-जगह ग्रामीणों ने यात्रा का स्वागत भी किया।

चौथे दिन की कथा के बाद दोपहर 3.30 बजे ढोल और डीजे के साथ चुनरी यात्रा निकाली गई। दो किमी तक पैदल चलकर श्रद्धालु चुनरी लेकर चंबल नदी के तट पर पहुंचे। गंगामाता मंदिर के पास चंबल तट पर पहुंचकर पूजा के बाद 11 नावों के माध्यम से चुनरी भगोर से कीरखेड़ा गांव तक ओढ़ाई गई। चंबल नदी किनारे 1 हजार वर्ष प्राचीन नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर के निर्माण के लिए मंच से संकल्प दिलाया गया।

तीन दिन में ही दानदाताओं ने 21 लाख रुपए की घोषणा कर दी। महाशिवरात्रि पर भूमिपूजन किया जाएगा। वर्ष 2027 की महाशिवरात्रि पर मंदिर के शिखर पर कलश स्थापना का संकल्प लिया गया। गुरुदेव ने लाड़ली बहनों द्वारा एक माह की राशि दान देने के संकल्प की सराहना की। संतों व आयोजन समिति ने मनोकामना नारियल यज्ञ में शामिल होने का आह्वान किया। श्रद्धालुओं से कहा गया है कि वे नारियल पर लच्छा बांधकर लाएं और यज्ञ में आहुति दें। इससे सर्वबाधा मुक्ति और मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद मिलेगा।

‘चंबल हजारों किसानों के साथ पूरे क्षेत्र के लिए मां अन्नपूर्णा

सप्तदिवसीय श्रीमद् देवी भागवत पुराण कथा के चौथे दिन कथा विश्राम पर महामंडलेश्वर मधुसूदन गिरी ने कहा कि चंबल सिर्फ एक नदी नहीं है, यह आस्था और विश्वास का केंद्र है। चंबल नदी का जल देश की सबसे स्वच्छ नदियों की श्रेणी में आता है। यह जहां से बहना प्रारंभ होती है, वहां से लेकर यमुना नदी में मिलने तक पूर्ण रूप से स्वच्छ रहती है। चंबल नदी में जो जीव-जंतु पाए जाते हैं, वे कहीं और नहीं मिलते। पूरे विश्व के पक्षी यहां आते हैं। चंबल हजारों किसानों के साथ पूरे क्षेत्र के लिए अन्नपूर्णा माता है। आप सौभाग्यशाली हैं कि चंबल माता आपके क्षेत्र में बहती हैं। हर धार्मिक और सामाजिक आयोजन में चंबल माता की पूजा की परंपरा बनाएं। चंबल के किनारे नर्मदा जी जैसे घाट बनवाएं, दीप प्रज्वलन करें और चुनरी ओढ़ाएं। चंबल का इतिहास 11 हजार वर्ष पुराना है। यह हमारे लिए पूजनीय और वंदनीय है।

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