रतलाम

Success Story Farmer: 7 साल से धाकड़ बंधु कर रहे जैविक खेती, 500 से अधिक किसानों को सिखाया आमदनी का गणित

Organic Farming: गांव में जैविक खेती अब प्रयोग नहीं बल्कि सफल मॉडल बनती जा रही है। किसान पुष्कर धाकड़ और दीपक धाकड़ 7 वर्षों से यह कर रहे हैं। आर्गेनिक तकनीक से वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद), जीवामृत तथा अन्य जैविक उत्पाद स्वयं तैयार कर खेती में उपयोग कर रहे हैं। उनकी यह पहल न केवल पर्यावरण के अनुकूल है बल्कि किसानों की लागत घटाकर आमदनी बढ़ाने में भी सहायक साबित हो रही है। उन्होंने इस मुहिम से 500 किसानों को जोड़ा है।

पुष्कर धाकड़ बताते हैं कि जैविक खेती एक टिकाऊ कृषि प्रणाली है। इसमें सिंथेटिक रसायनों, कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों के बजाय प्राकृतिक खादों और जैव-कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद, गोबर की खाद और जैव उर्वरकों से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। वहीं फसल चक्र और जैव विविधता पर जोर देने से जमीन लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहती है। धाकड़ भाइयों की खेती में मुख्य उर्वरकों के रूप में गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद का उपयोग किया जाता है। कीट नियंत्रण के लिए रासायनिक दवाओं की जगह नीम का तेल, जीवामृत और मित्र कीटों का सहारा लिया जाता है। साथ ही फसल चक्र, मिश्रित फसल और हरी खाद के लिए डैचा और सनई जैसी फसलें उगाई जाती हैं। इससे मिट्टी की संरचना सुधरती है और जल धारण क्षमता बढ़ती है।

गोबर व गोमूत्र से वर्मी कम्पोस्ट और जीवामृत तैयार कर खेती की जरूरतें कर सकते हैं पूरी

सात वर्षों के अनुभव साझा करते हुए धाकड़ कहते हैं कि रासायनिक खेती की तुलना में जैविक खेती में खर्च कम आता है। अधिकांश किसानों के पास दो-तीन दुधारू पशु होते हैं, जिनसे गोबर और गोमूत्र आसानी से उपलब्ध हो जाता है। इससे वर्मी कम्पोस्ट और जीवामृत तैयार कर खेती की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं।

किसानों को घर जाकर सिखाया खाद बनाना

धाकड़ भाइयों की पहल केवल अपनी खेती तक सीमित नहीं है। वे रियावन क्षेत्र में किसानों को निःशुल्क प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। अब तक 500 से अधिक किसानों को घर पर वर्मी कम्पोस्ट और जैविक खाद बनाने की तकनीक सिखाई जा चुकी है। इसके परिणामस्वरूप कई किसान लहसुन, अफीम, प्याज और सफेद मूसली जैसी फसलों में बेहतर उत्पादन लेकर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।

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