मप्र में दलहन खरीदी से मंडी और निराश्रित शुल्क हटाया, चने की एमएसपी में 225 रुपए की बढ़ोतरी

MP News: मध्यप्रदेश में तुअर, उड़द, चना और मसूर की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीदी के लिए पंजीयन 20 फरवरी से 17 मार्च तक किए जाएंगे। इस बार सरकार ने दलहन खरीदी को बढ़ावा देने के लिए अहम फैसला लिया है। नाफेड और एनसीसीएफ के जरिए होने वाली खरीदी से मंडी और निराश्रित शुल्क हटा दिए गए हैं। इससे सरकारी एजेंसियों की लागत घटेगी। दावा है कि इससे ज्यादा केंद्रों पर खरीदी संभव होगी। किसानों को एमएसपी पर उपज बेचने में आसानी होगी। निजी व्यापारियों पर निर्भरता कुछ हद तक कम होने की उम्मीद है। खरीदी प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर भी निर्देश जारी किए गए हैं।
चने की एमएसपी में 225 रुपए की बढ़ोतरी
विपणन वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने दलहन फसलों के समर्थन मूल्य बढ़ाए हैं। चना का एमएसपी 5,875 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है, जो पिछले साल 5,650 रुपये था यानी 225 की बढ़ोतरी हुई है। मसूर का एमएसपी 7,000 रुपये प्रति क्विंटल किया है, जो पहले 6,700 था, इसमें 300 रुपये की वृद्धि हुई है। तुअर (अरहर) का एमएसपी 8,000 रुपये प्रति क्विंटल तय हुआ है, जो पिछले साल 7,550 था, यानी 450 रुपये बढ़ा है। उड़द का एमएसपी 7,800 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है, जो पहले 7,400 था, इसमें 400 रुपये की बढ़ोतरी हुई है।
ई-उपार्जन पोर्टल पर करें पंजीयन
दलहन किसानों को एमएसपी पर उपज बेचने के लिए एमपी ई-उपार्जन पोर्टल पर पंजीयन कराना होगा। किसान mpeuparjan.nic.in या नजदीकी लोक सेवा केंद्र/कियोस्क से भी रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं। पंजीयन के बाद किसान को स्लॉट बुकिंग करनी होगी, जिसके अनुसार तय तारीख पर उपज बेची जा सकेगी। तुअर, उड़द, चना और मसूर की खरीदी नाफेड और एनसीसीएफ के अधिकृत उपार्जन केंद्रों पर होगी। उपज बेचने के बाद भुगतान आधार लिंक बैंक खाते में सीधे डीबीटी के जरिए किया जाएगा।
45 लाख हेक्टेयर है दलहन का रकबा
प्रदेश में तुअर, उड़द, चना और मसूर का कुल रकबा करीब 45 लाख हेक्टेयर के आसपास है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा चने का है, जो 18 से 20 लाख हेक्टेयर में बोया जाता है। मसूर का रकबा 6 से 7 लाख हेक्टेयर के बीच है, जबकि तुअर 5 से 6 लाख और उड़द 3 से 4 लाख हेक्टेयर में बोई जाती है। यानी दलहन उत्पादन का आधार बड़ा है, लेकिन इसी बड़े रकबे के कारण खरीदी, भंडारण और केंद्रों की क्षमता सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है।


































