Women Success Story: डाकुओं के डर से नेतृत्व की दहलीज़ तक, सागर की ललिता यादव बनी लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत

Success Story Of Lalita Yadav: बुंदेलखंड का नाम कभी डाकुओं के आतंक और असुरक्षा के लिए जाना जाता था। उस दौर में राजनीति में आना साहस नहीं, जोखिम था, खासतौर पर महिलाओं के लिए। लेकिन ललिता यादव ने डर को चुनौती दी और व्यवस्था से टकराने का रास्ता चुना। सागर के एक साधारण परिवार में जन्मी ललिता यादव की सोच शुरू से ही अलग थी। शिक्षा के प्रति रुचि और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें एलएलबी तक पहुंचाया। यही सोच आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन की रीढ़ बनी। विवाह के बाद उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरी गरिमा के साथ निभाया, वहीं ससुराल और परिवार ने उनके नेतृत्व गुणों को पहचाना। वर्ष 1991 में भारतीय जनता पार्टी से जुड़कर उन्होंने जमीनी राजनीति की शुरुआत की। घर-घर जाकर समस्याएँ सुनना, महिलाओं को संगठित करना और विकास को प्राथमिकता देना, यही उनका राजनीतिक मंत्र रहा। हार-जीत उनके लिए मंजिल नहीं, सीख रही।
1994 में पहला चुनाव हारने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। महिला मोर्चा से लेकर नगर परिषद अध्यक्ष और फिर विधायक तक का सफर उनकी जिद, मेहनत और जनता के भरोसे की कहानी है। छतरपुर में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रेलवे और पर्यटन के क्षेत्र में किए गए कार्य उनके विकास मॉडल को परिभाषित करते हैं। कोविड जैसे संकट में उन्होंने शासन-प्रशासन और जनता के बीच सेतु बनकर काम किया। डिजिटल व्यवस्था से योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, यह उनकी प्राथमिकता रही। ललिता यादव आज सिर्फ एक विधायक नहीं, बल्कि उस बुंदेलखंड की पहचान हैं, जिसने डर से निकलकर विकास का रास्ता चुना।
जब पहली बार जनपद पंचायत जीती भाजपा
विधायक ललिता यादव के दो पुत्र और एक पुत्री है। आजादी के बाद सामंतशाही के कारण कभी भाजपा छतरपुर जनपद पंचायत में अध्यक्ष पद पर जीत नहीं पाई थीं। विधायक ललिता यादव ने लगातार संघर्ष करके भाजपा की अध्यक्ष पद पर जीत का रास्ता तैयार किया। 2009 में विधायक ललिता यादव की पुत्रवधु और 2014 में पुत्र राजेंद्र सिंह यादव जनपद अध्यक्ष बने। तब से लगातार भाजपा ही जनपद पंचायत अध्यक्ष पद पर काबिज है।
कोविड काल में सेवा का संकल्प
महामारी के समय जब हर सांस अनमोल थी, ललिता यादव ने जमीनी स्तर पर समन्वय और संवेदनशीलता के साथ काम किया। डिजिटल सिस्टम से योजनाओं का लाम सौधे लोगों तक पहुँचा। वे मानती हैं कि तकनीक तभी उपयोगी है, जब वह आम आदमी का बोझ कम करें। संकट में खड़ा नेतृत्व ही असली नेतृत्व होता है, यह उन्होंने सच किया।
संगठन से सत्ता तक का सफर
संगठन ने ललिता यादव की काबिलियत की समझा और उन्हें महिला मोर्चा की जिला अध्यक्ष, नगर परिषद अध्यक्ष और प्रदेश स्तर की जिम्मेदारियां दीं। 1999 नगर पालिका चुनाव में ऐतिहासिक जीत और प्रदेश में पहला स्थान उनके नेतृत्व की स्वीकृति थी। जनता का भरोसा उनका सबसे बड़ी पूंजी बनी। ललिता यादव ने वर्ष 2008, 2013 और 2018 में लगातार तीन बार विधायक का चुनाव जीता और सन् 2018 में मंत्री पद का दायित्व निभाया तथा वर्ष 2023 में पुनः विधायक निर्वाचित हुई।
छतरपुर को शिक्षा व स्वास्थ्य का केंद्र बनाने की पहल
छतरपुर में बाईपास, रेलवे विस्तार, छत्रसाल विश्वविद्यालय और मेडिकल कॉलेज, ये सिर्फ परियोजनाएँ नहीं, बल्कि भविष्य की नींव हैं। पर्यटन की बढ़ावा देने के लिए सुविधाओं का विस्तार ही रहा है। उनका मानना है कि विकास तभी सार्थक है, जब युवाओं को घर से बाहर न जाना पड़े। शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश से क्षेत्र की तस्वीर बदली है।
लक्ष्य, ईमानदारी और तकनीक, सफलता की कुंजी
ललिता यादव युवाओं और महिलाओं को साफ संदेश देती हैं कि राजनीति या जीवन में सफलता का रास्ता ईमानदारी और स्पष्ट लक्ष्य से होकर जाता है। पैसा साधन हो सकता है, साध्य नहीं। नई तकनीक सीखिए, बदलाव को अपनाइए और समाज के लिए कुछ करने का साहस रखिए।


































