मध्यप्रदेश

Success Story: 2 साल की रिसर्च, एक बीघा जमीन व मजबूत इरादे के दम पर मनासा के दो युवाओं ने ड्रैगन फ्रूट से बदली खेती की तस्वीर

Dragon Fruit Farming: मप्र के नीमच जिले में रहने वाले हरीश पाटीदार के पिता के हार्ट अटैक ने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। सीमित संसाधनों और पारंपरिक खेती से कम मुनाफे के बीच हरीश ने तय किया कि अब कुछ नया करना होगा। कोविड काल में समय मिला तो उन्होंने दोस्त महेश भट्ट के साथ दो साल तक ऑनलाइन-ऑफलाइन रिसर्च की। किसान, वैज्ञानिक, यूट्यूब वीडियो, फील्ड विजिट और लागत-मुनाफे के आंकड़ों को समझने के बाद दोनों ने ड्रैगन फ्रूट उगाने का निर्णय लिया।

मनासा तहसील के हाड़ीपिपलिया गांव में एक बीघा जमीन पर करीब 300 पौधे लगाए। पौधे हैदराबाद से – मंगवाए और शुरुआत से ही ड्रिप – सिंचाई प्रणाली अपनाई। दो साल की मेहनत के बाद अब पौधों पर फल आना शुरू हो गया है। इस सीजन में 4 से 5 टन उत्पादन की उम्मीद है। बाजार भाव के अनुसार 3.5 से 4 लाख रुपए तक शुद्ध मुनाफा मिलने का अनुमान है। हरीश बताते हैं कि पहले गेहूं-चना-सोयाबीन जैसी परंपरागत फसलों में लागत ज्यादा और जोखिम भी अधिक था। मौसम की मार अलग। ड्रैगन फ्रूट में पानी कम लगता है, रोग कम होते हैं और बाजार में मांग लगातार बढ़ रही है। डेंगू व अन्य बीमारियों में डॉक्टर भी इसे खाने की सलाह देते हैं जिससे इसकी कीमत स्थिर रहती है। उनके दोस्त महेश भट्ट पहले एक निजी कंपनी में 60 हजार रुपए महीने की नौकरी करते थे। खेती के परिणाम देखकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और अब पूरी तरह खेती में साझेदार बन गए हैं।

खेती क्यों साबित हो रही फायदेमंद

इसमें कम पानी के साथ रोग भी कम लगता है। 18-20 दिन तक सुरक्षित रहता है। बाजार में 80-100 रु. नग तक थोक भाव हैं। यह 25 साल तक फल देने वाला पौधा है। इसमें मौसम का जोखिम भी अपेक्षाकृत कम रहता है। हरीश ने सियाम रेड वैरायटी लगाई है जो मध्यप्रदेश के मौसम के अनुकूल है। पौधों के चारों ओर मजबूत खंभे लगाए हैं और जैविक खाद का अधिक उपयोग किया है। दोनों किसान अब आसपास के अन्य किसानों को भी ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनके अनुसार ड्रैगन फ्रूट कैक्टस परिवार पौधा है जो बेल की तरह बढ़ता है और सहारे की जरूरत होती है। इसके लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान आदर्श माना जाता है। यह कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देता है और 42-45 डिग्री तापमान तक सहन कर सकता है। मालवा क्षेत्र का मौसम इसके लिए अनुकूल साबित हो रहा है।

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